
झारखंड के गढ़वा जिला के अंतर्गत जन सुविधाओं की प्रबंधन में सरकार की उदासीनता का चौंकाने वाला एक तस्वीर सामने आई है जिसमें सीधा असर इससे लाखों ग्रामीणों को ऊपर पड़ रहा है जिसका मुख्य उद्देश्य है कि 1988 में पिछली बार चापाकल मिस्त्री का नियुक्ति हुआ था जिससे अब तक की बाहरी में लगभग 38 वर्ष हो चुका है जो यह बहाली की प्रक्रिया पूरी तरह से ठप हो चुका है जिसका सीधा असर जिले मैं सरकारी मैकेनिक को की कोई टीम मौजूद नहीं है जिससे पानी की आपूर्ति नहीं हो पा रही और चपकालों की रखरखाव पूरी नहीं हो पा रही है और यह व्यवस्था पूरी तरह से ठप हो गया है।
गहरा संकट
जिस जिले के अंदर कई चापाकल खराब हो चुके हैं जिसका रखरखा नहीं हो पा रहा है और 4700 से अधिक चापाकल अब पूरी तरह से बंद हो चुके हैं जो जिले में कुल 15000 से अधिक चापाकल है जो अब 4700 से अधिक चापाकल का हैंड पंप पूरी तरह से निष्क्रिय हो चुका है जिससे सीधा असर जिले के लाखों ग्रामीण पर पड़ रहा है और खराब होने की वजह से चापाकल के कारण ग्रामीणों की आबादी में पानी पीने के लिए गंभीर संकट से जूझना पड़ रहा है जिससे टेंडर सिस्टम में मिस्रियों की कमी के कारण वह मरम्मत में कमी से निजी टेंडर सिस्टम के भरोसे या चल रहा है जो बेहद ही महंगा पड़ रहा है जो सरकारी सिस्टम न होने के कारण मरम्मत का खर्च बेहद बढ़ गया है जया 2025 के अप्रैल में अर्जुन के महीना में मरम्मत के लिए 12.24 लाख खर्च कर दिए गए हैं जिससे जल विशेषज्ञ का मानना है कि यदि जिले में सरकारी प्लंबरों की नियुक्ति हो जाती है तो मरम्मत पर खर्च आधा हो जाएगा और गांव में पानी की उपलब्धता पूरी तरह से सुनिश्चित हो जाएगी जो इस संकट के देखते हुए गढ़वा जिले में तत्काल कम से कम 20 सरकारी प्लंबरों की आवश्यकता है जिसमें सरकार की स्तर पर बहाली का फैसला अभी पूरी तरह से अटका हुआ है जो एक तरफ से हजारों चापाकल बंद पड़े हैं और लोग पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक बिलों के कारण जनता की बुनियादी जरूरत नहीं हो पा रही हैं।